धर्म छेत्रे कुरुचित्रे समवेता युयुतसव



" धर्म छेत्रे कुरुचित्रे समवेता युयुतसव : |मामका : पांण्डवाचैव किम कुर्वत संजय | | "


  • शरीर को धारण कर उस शरीर से कर्म करने पर, उस में उपस्थित बुद्धिमता, संयम विवेक से उत्पन्न गुण जो एक लय में बोलते हैं तथा एक दूसरे के विपरीत क्या करते हैं ? यह एक कल्पना है |
  • जब हमारी मस्तिष्क का पहला center ( IESM ) एक सामंजस्य में आ जाते, तो हमारा सहज बोध केंद्र तक विकसित हो जाता है, तो हमारा पहला केंद्र अपने गुणों के द्वारा शरीर ( छेत्र ) में किये कार्यों को देखता है |
  • जब भी हम चेतन की और जाते हैं और साक्षी में स्थित होकर अपने द्वारा किया गया अच्छा और बुरा कर्म देखते हैं तो हमें गहन शोक होता है; यही ध्यान मार्ग की बाधा है |
  • जब हम केवल कल्पना की दुनिया में ही भटकते रहते हैं तो हमें भगवत गीता पढ़नी चाहिए |


"गलत-सही का विवेक होने पर भी गलत का चुनाव विनाश की और ले जाने वाला है |
मुझे गलत और सही क्या क्या है ? का विवेक है और में हमेशा सही का चुनाव करता हूँ | "
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